स्लिप डिस्क क्या है?

Man suffering from lower back pain due to slip disc.

स्लिप डिस्क के कारण कमर दर्द से परेशान पुरुष।

स्लिप डिस्क रीढ़ की हड्डी से जुड़ी एक आम समस्या है, जिसे मेडिकल भाषा में Herniated Disc या Bulging Disc कहा जाता है। हमारी रीढ़ की हड्डी कई छोटी-छोटी हड्डियों से बनी होती है, जिनके बीच में डिस्क होती है। ये डिस्क कुशन की तरह काम करती हैं और हड्डियों को आपस में रगड़ने से बचाती हैं।

जब किसी कारण से यह डिस्क अपनी जगह से खिसक जाती है या बाहर की ओर उभर जाती है, तो उसे स्लिप डिस्क कहा जाता है। इस स्थिति में नसों पर दबाव पड़ सकता है, जिससे दर्द और अन्य समस्याएं शुरू हो जाती हैं।

स्लिप डिस्क क्यों होती है?

स्लिप डिस्क होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। यह समस्या किसी भी उम्र में हो सकती है, लेकिन 30 से 60 वर्ष की उम्र में ज्यादा देखने को मिलती है।

मुख्य कारण:

  • गलत पोश्चर में बैठना या खड़े होना
  • भारी वजन उठाना
  • अचानक झटका लगना
  • लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठना
  • उम्र बढ़ने के साथ डिस्क का कमजोर होना
  • मोटापा
  • शारीरिक गतिविधि की कमी

स्लिप डिस्क के प्रकार

स्लिप डिस्क रीढ़ की अलग-अलग जगहों पर हो सकती है।

  • सर्वाइकल स्लिप डिस्क (गर्दन में)
  • थोरासिक स्लिप डिस्क (पीठ के ऊपरी हिस्से में)
  • लंबर स्लिप डिस्क (कमर के निचले हिस्से में)

इनमें लंबर स्लिप डिस्क सबसे ज्यादा आम होती है।

स्लिप डिस्क के लक्षण

स्लिप डिस्क के लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि डिस्क किस जगह पर है और नसों पर कितना दबाव पड़ रहा है।

आम लक्षण:

  • कमर या गर्दन में तेज दर्द
  • दर्द का पैरों या हाथों तक फैलना
  • झनझनाहट या सुन्नपन
  • मांसपेशियों में कमजोरी
  • बैठने या उठने में परेशानी
  • लंबे समय तक खड़े रहने में दर्द

कुछ मामलों में दर्द बहुत तेज हो सकता है, जिससे रोजमर्रा के काम करना मुश्किल हो जाता है।

स्लिप डिस्क और सायटिका का संबंध

लंबर स्लिप डिस्क में अक्सर सायटिका दर्द देखने को मिलता है। इसमें कमर से लेकर पैर तक तेज दर्द महसूस होता है। यह तब होता है जब डिस्क सायटिक नर्व पर दबाव डालती है।

स्लिप डिस्क की जांच कैसे होती है?

डॉक्टर सबसे पहले मरीज की शिकायत और शारीरिक जांच करते हैं। इसके बाद जरूरत पड़ने पर कुछ टेस्ट करवाए जाते हैं।

जांच में शामिल हो सकता है:

  • एक्स-रे
  • एमआरआई (MRI)
  • सीटी स्कैन
  • न्यूरोलॉजिकल टेस्ट

इन जांचों से डिस्क की स्थिति और नसों पर पड़ रहे दबाव का सही पता चलता है।

Doctor reviewing MRI X-ray scan.

डॉक्टर एक्स-रे रिपोर्ट की जांच करते हुए।

क्या स्लिप डिस्क बिना सर्जरी ठीक हो सकती है?

अधिकतर मामलों में स्लिप डिस्क का इलाज बिना सर्जरी के संभव होता है। सही समय पर इलाज शुरू करने से दर्द और समस्या काफी हद तक कम की जा सकती है।

बिना सर्जरी इलाज में शामिल हैं:

  • दवाएं (Painkillers, Muscle relaxants)
  • फिजियोथेरेपी
  • हॉट और कोल्ड थेरेपी
  • सही पोश्चर अपनाना
  • वजन कंट्रोल करना

लगभग 80–90 प्रतिशत मरीज बिना सर्जरी के बेहतर महसूस करते हैं।

फिजियोथेरेपी का रोल

फिजियोथेरेपी स्लिप डिस्क के इलाज में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इसके फायदे:

  • मांसपेशियों को मजबूत बनाना
  • दर्द कम करना
  • मूवमेंट बेहतर करना
  • दोबारा स्लिप डिस्क होने से बचाव

फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा बताए गए एक्सरसाइज नियमित रूप से करना जरूरी होता है।

स्लिप डिस्क में सर्जरी कब जरूरी होती है?

हर स्लिप डिस्क में सर्जरी की जरूरत नहीं होती। लेकिन कुछ मामलों में सर्जरी जरूरी हो सकती है।

सर्जरी की सलाह तब दी जाती है जब:

  • लंबे समय तक दर्द कम न हो
  • नसों पर ज्यादा दबाव हो
  • हाथ या पैर में गंभीर कमजोरी आ जाए
  • पेशाब या मल पर कंट्रोल न रहे

स्लिप डिस्क में क्या सावधानियां रखें?

दैनिक जीवन में कुछ सावधानियां अपनाकर स्लिप डिस्क को बिगड़ने से रोका जा सकता है।

  • सही तरीके से बैठें और उठें
  • भारी सामान उठाने से बचें
  • नियमित एक्सरसाइज करें
  • लंबे समय तक झुककर काम न करें
  • वजन संतुलित रखें

स्लिप डिस्क से बचाव कैसे करें?

स्लिप डिस्क से पूरी तरह बचाव संभव नहीं है, लेकिन जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

  • रोजाना हल्की स्ट्रेचिंग
  • एक्टिव लाइफस्टाइल
  • सही गद्दे का इस्तेमाल
  • लंबे समय तक मोबाइल या लैपटॉप पर झुककर न बैठें

कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

अगर आपको:

  • लगातार कमर या गर्दन दर्द
  • दर्द का हाथ या पैर तक जाना
  • सुन्नपन या कमजोरी
  • दर्द बढ़ता जाए

तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

Prakash Hospital में स्लिप डिस्क का इलाज

Prakash Hospital में स्लिप डिस्क के लिए अनुभवी ऑर्थोपेडिक और स्पाइन विशेषज्ञों द्वारा आधुनिक जांच और इलाज की सुविधा उपलब्ध है। यहां मरीज की स्थिति के अनुसार दवाएं, फिजियोथेरेपी और जरूरत पड़ने पर सर्जिकल ट्रीटमेंट प्रदान किया जाता है, जिससे मरीज सुरक्षित और प्रभावी राहत पा सके।

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